गुरुवार, 21 नवंबर 2013

उपयोगी जानकारिया ( पेज न.3)

                                                   उपयोगी जानकारिया   

                                                          

21. चरण स्पर्श की परंपरा:-  चरण स्पर्श की क्रिया में अंग संचालन की शारीरिक क्रियाएँ व्यक्ति के मन में उत्साह, उमंग, चैतन्यता का संचार करती है। यह अपने आप में एक लघु व्यायाम और यौगिक क्रिया भी है, जिससे मन का तनाव, आलस्य और मनो-मालिन्यता से मुक्ति भी मिलती है। 

22. गुरु दीक्षा का महत्व:-  गुरु-दीक्षा गुरु की असीम कृपा और शिष्य की असीम श्रद्धा के संगम से ही सुलभ होती है। गुरु गीता में लिखा है- जिस व्यक्ति के मुख में गुरु मंत्र है, उसके सभी कार्य सहज ही सिद्ध हो जाते है। गुरु-दीक्षा के कारण शिष्य सर्वकार्य सिद्धि का मन्त्र प्राप्त कर लेता है। गुरु-दीक्षा मुख से मन्त्र बोलकर, दृष्टि के द्वारा अंतर्मन को जगाकर और स्पर्श के द्वारा कुंडलिनी शक्ति को जागृत करके दी जाती है। मंत्र द्वारा बोलकर दी गयी गुरु-दीक्षा को मांत्रिक दीक्षा, दृष्टि से दी गयी दीक्षा को शांभवी दीक्षा और स्पर्श से दी गयी दीक्षा स्पर्श दीक्षा कहलाती है। गुरु-दीक्षा के बिना कोई भी सिद्धि प्राप्त करना सम्भव नहीं है। गुरु-दीक्षा एक विज्ञानसम्मत परिपाटी भी है। 

23. ब्राह्मण को दक्षिणा:-  ब्राह्मण के सम्बन्ध में मनुस्मृति में कहा गया है कि षट्कर्मों में पढ़ाना, यज्ञ कराना और विशुद्ध द्विजातियों से दान ग्रहण करना आदि तीन कर्म ब्रह्मणो के जीविकोपार्जन के साधन है। अथर्ववेद में कहा गया है कि जो मनुष्य देवताओ के निमित्त याचित गाय और द्रव्य ब्रह्मणो को नहीं देते, देवता उन्हें दंडित करते है। 

24. राम नाम के जप का महत्व:-  राम नाम की महिमा अपरम्पार है। यह अत्यंत विलक्षण, चमत्कारी और सभी पापो का नाश करने वाले है। पध्यपुराण में राम नाम की महिमा बताते हुए कहा गया है कि जिस प्राणी के कानो में 'राम' नाम अकस्मात भी पड जाता है, यह उसके पापो को उसी प्रकार जला देता है, जिस प्रकार अग्नि की चिंगारी रुई को जला डालती है। राम नाम का हर समय और हर कार्य करते हुए जप करने से मनुष्य को परमगति मितली है। स्कंदपुराण के नागरखंड में राम नाम के जप का महत्व दर्शाते हुए कहा गया है कि चलते-फिरते, उठते-बैठते और सोते-जागते किसी भी समय जो मनुष्य राम नाम का जप करता है, वह कृतकार्य हो जाता है और अंततः भगवान विष्णु का पार्षद बनता है। 

25. नित्य अग्निहोत्र क्यों ? :-  अथर्ववेद के अनुसार अग्निहोत्रीणे प्रणुदे सपत्नान अर्थात अग्निहोत्र करने से शत्रुओ का नाश होता है। यहाँ पर शत्रुओ के नाश से तात्पर्य रोग, शोक, क्लेश आदि सभी विकारो को नष्ट करने से है। ऐसा होने पर निश्चित तौर पर मानसिक शांति और आनंद की अनुभूति होती है। साथ ही घर का वातावरण शुद्ध और सात्विक होता है। 

26. पूजा में दीप प्रज्वलन का महत्व:-  सृष्टि में सूर्यदेव को जीवन-ऊर्जा का स्त्रोत माना गया है और पृथ्वी पर अग्निदेव को सूर्यदेव का परिवर्तित रूप कहा गया है। इसी कारण जीवन प्रदान करने वाली जीवन-ऊर्जा को केंद्रीभूत करने के लिए दीप में प्रज्ज्वलित होने वाली अग्नि के रूप में सूर्यदेव को देव-पूजन आदि में अनिवार्य रूप से सम्मिलित किया जाता है। शारीरिक संरचना के पांच प्रमुख तत्वो में अग्नि का भी प्रमुख स्थान है। ऐसा कहा जाता है कि अग्निदेव की उपस्थिति में उन्हें साक्षी मानकर किये गए कार्यो में सफलता अवश्य मिलती है और प्रज्ज्वलित दीप में अग्निदेव वास करते है। इस प्रकार प्रभु की पूजा-अर्चना करते समय और अपनी भक्ति को सफल करने के लिए दीप प्रज्ज्वलित किये जाते है। 

27. आचमन तीन बार ही क्यों ? :-  आचमन से कंठशोषण दूर होकर कफ की निवृति होती है, जिससे श्वसन क्रिया व मंत्रोच्चारण में शुद्धता आती है। इसी कारण प्रत्येक धार्मिक कार्यो में तीन बार आचमन किया जाता है। इस तरह तिन वेद- ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद भी प्रसन्न होते है और मनोकामना पूर्ण करते है। 

28. सूर्योपासना में अघर्य का महत्व:-  स्कन्दपुराण के काशीखण्ड के अनुसार सूर्यदेव की आराधना से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति होती है। इसके साथ ही धन-धान्य, आयु, स्वास्थ्य, पुत्र, पशु, धन, विविध भोग और स्वर्ग आदि भी सहज ही प्राप्त हो जाते है। ऋग्वेद के अनुसार सूर्यदेव में पापो से मुक्ति, रोगो का नाश करने, आयु एवं सुखो में वृद्धि करने तथा दरिद्रता निवारण की अपार क्षमता है। इसी कारण ऋग्वेद में इनके संतुलन हेतु सूर्यदेव से प्रार्थना की गयी है। वेदो में ओजस्, तेजस और ब्र्ह्मवर्चस्व की प्राप्ति के लिए सूर्योपासना करने का विधान दिया गया है। अग्निपुराण के अनुसार गायत्री मन्त्र के द्वारा सूर्योपासना करने पर वे प्रसन्न होते है। और उपासक को मनोवांछित फल प्रदान करते है। 

29. संपति की करे सुरक्षा:-  सम्पति को अपहरण से सुरक्षित करने, रुका धन पाने, दिया ऋण प्राप्त करने के लिए कार्तवियार्जुन का पाठ करे। यह लाभप्रद रहता है। इसे शुभ दिन से शुरू करे और रोज पाठ करे, तो सम्पति की सुरक्षा और अपने धन को प्राप्त करने में मदद मिलती है। 

30. शुभ है फेंगशुई बांस:-  दीर्घायु प्राप्ति के लिए फेंगशुई में बांस के पौधे को महत्वपूर्ण माना जाता है।बांस का पौधा लम्बी आयु और अच्छे स्वास्थ्य का प्रतीक है। यह अच्छे भाग्य का संकेत देता है और ऑफिस या घर पर लगाने से लाभ देता है। अनुकूल समय आने पर यह खूब बढ़ता है। 

31. माला से मन शुद्धि:-  माला फेरने का आश्य मंत्रो को श्रृंखलाबद्ध तरीके से निश्चित प्रक्रिया में फेरना है।माला से जप करते समय अनामिका का प्रयोग नहीं करे। यह मन शुद्धि करती है। जप करते समय पूर्वाभिमुख या उतराभिमुख, स्वच्छ आसन, वस्त्रो के साथ बैठे। 

32. दोष करे दूर:-  तुलसी को पवित्र पौधा माना जाता है। यह घर में लगाने, जल देने, दर्शन करने से मनुष्य वाणी, तन और मन के समस्त दोष दूर करता है। तुलसी का पौधा पर्यावरण को भी शुद्ध करने का काम करता है। 

33. सर्वविघ्न नाशक गणपति:-  मांगलिक कार्यो अथवा संकट के समय सुमुख, एकदंत, कपिल गजकर्ण, लम्बोदर, विकट, विघ्ननाशक, विनायक, धूम्रकेतु, गणाध्यक्ष, भालचंद्र और गजानन। इन बारह नामो का पाठ करने पर किसी भी प्रकार का विघ्न नहीं होता। 

34. मनोकामना पूरी होगी:-  व्यापार वृद्धि के लिए श्वेतार्क गणपति या पारदेश्वर गणपति की पूजा अर्चना करनी चाहिए। इनकी विधिवत स्थापना से व्यापार में लाभ, नौकरी में उन्नति, रोजगार व विद्यार्थियो को पढ़ाई में लाभ होता है। नियमित पूजा से मनोकामना पूरी होती है। 

35. शिक्षा में बाधा भगाओ:-  गणपति को विद्या, बुद्धि, ज्ञान और लेखन कार्य का प्रदाता माना गया है।पढ़ाई में असफल होने पर गणेश जी के मंत्र ॐ हीं-ग्रीं-हीं या ॐ वक्रतुण्डाय हुं के 108 बार पाठ करने से प्रतियोगी को परीक्षाओ में सफलता मिलेगी, पढ़ाई में आ रही रूकावट दूर होगी। 

36. कर्ज मुक्ति के लिए:-  समस्त कर्ज मुक्ति के लिए भगवान श्री गणेश जी के 'ऋणहर्ता' गणेश स्त्रोत' का पाठ एक वर्ष तक प्रतिदिन एक बार एकाग्रचित होकर श्रद्धा और विश्वास के साथ करे। प्रतिदिन भगवान गणपति की पूजा कर इस मंत्र के जाप से धन की प्राप्ति होती है। 

37. संतान बाधा निवारक पाठ:-  जिन स्त्रियो के संतान होने में बाधा आ रही हो तो वह श्रद्धा और विश्वास के साथ भगवान गणपति की प्रतिदिन विधिपूर्वक पूजा कर 'गणेश अर्थत्वशीर्ष' का पाठ करे। इससे अवश्य लाभ होगा। पूजा में लड्डू का नैवेध अवश्य चढ़ाये। 

38. गणपति की कृपा प्राप्ति:-  गणपति की कृपा प्राप्ति के लिए प्रतिदिन स्नान आदि से शुद्ध होकर उनकी प्रतिमा के सन्मुख चन्दन-पुष्प, धूप, दीप, नैवेध आदि से पूजन करे। साथ ही इस दौरान ॐ गं गणपतये नमः मन्त्र का पांच, ग्यारह अथवा इक्कीस बार पाठ करे। 

39. मिलेगा जीवनसाथी:-  कभी-कभी कुंडली में बुध ग्रह नीच राशि में हो, शत्रु राशि में दो प्रतिकूल प्रभाव विवाह में बाधक हो तो जातको को प्रत्येक माह में पुण्य नक्षत्र में गणेशजी को दूध से अभिषेक कराना चाहिए। हर बुधवार को गणपति को दूर्वा, मूंग, सिंदूर और मूंग के लड्डू चढ़ाये। 

40. मन्त्र से भगाए रोग:-   गणायै पूर्णत्व सिद्धि देहि-देहि नमः। भगवति मृतसंजीवनि मम शांति कुरु कुरु स्वाहा।। - इस मंत्र का जाप करने से उपचार के पश्चात ठीक न होने वाली बीमारियो, असाध्य रोगो में लाभ मिलता है।  


                                         

                      

बुधवार, 20 नवंबर 2013

उपयोगी जानकारिया ( पेज न.2)

                                                   उपयोगी जानकारिया 
                                                      
                                                           पेज न. 2

9. शुभ, समृद्धि का नारियल:-  पौराणिक कथाओ में नारियल को 'कल्पतरू' कहकर सम्बोधित किया गया है यानि जो मांगो वह मिलता है। नारियल में ब्रह्मा, विष्णु और महेश का निवास भी माना गया है। नारियल भगवान शिव का भी परमप्रिय फल है। तंत्रशास्त्र के अनुसार नारियल की भेंट को बली के समान ही मान्यता प्राप्त है।     

10. शनिदेव पर तेल क्यों चढ़ाते है ? :-  आनंद रामायण की एक कथा के अनुसार लंका पर चढाई के लिए समुद्र पर बांधे गए पुल की सुरक्षा का भार हनुमानजी को सौंपा गया था। हनुमान जी रात में भगवन राम का ध्यान करते हुए पुल की रक्षा कर रहे थे कि वहाँ शनिदेव आ पहुचे और उन्हें व्यंग्यबाणो से परेशान करने लगे।हनुमान जी ने शनिदेव के सारे आक्षेपो को स्वीकार करते हुए कहा कि कृपया वह उन्हें पुल की रक्षा करने दे, लेकिन शनिदेव बाज नही आये। अंततः क्रोधित होकर हनुमानजी ने शनिदेव को अपनी पूंछ में जकड कर इधर-उधर पटकना शुरू कर दिया। काफी देर बाद हनुमाना जी ने उन्हें मुक्त किया और दर्द से निजात पाने के लिए एक तेल लगाने को दिया। इसके बाद ही शनिदेव को तेल चढ़ाते है। 

11. इसलिए नहीं सोते है दिन में:-  शास्त्रो के अनुसार दिवास्वापं च वजयेत अर्थात दिन में नहीं सोना चाहिए। आयुर्वेद भी यही कहता है कि दिन में सोना अनेक बीमारियो को आमंत्रित करता है। ग्रीष्म ऋतु में दिन के बड़े होने एवं सूर्य के ताप में वृद्धि होने से थोडा-बहुत आराम कर लेना ठीक है। शेष अन्य ऋतुओ में दिन में सोना हानिप्रद होता है। 

12. श्रद्धा और विश्वास का जोर:-  विश्वास करना मनुष्य की प्रकृति है। संसार के समस्त कार्यो को पूरा करने के लिए विश्वास एक माध्यम है, क्योकि मनुष्य अकेले सारे कार्य नहीं कर सकता है। इस प्रकार बगैर श्रद्धा और विश्वास के संसार का कोई भी कार्य नहीं चलता है। इंसान के सारे कार्य विश्वास पर ही आधारित होते है। विश्वास और श्रद्धा के मामले में ईश्वर एवं सद्गुरु की तो बात ही निराली है। ईश्वर सद्गुरु और सद्शास्त्र शाश्वत सत्य है। ईश्वर सर्वज्ञ एवं शांतिमय है। सद्गुरु प्रज्ञा को जगाने वाला ब्रह्म स्वरुप ही है। अतः इन पर श्रद्धा का होना, विश्वास का होना सुनिश्चित ही है। ईश्वर सर्वत्र है, जहाँ श्रद्धा एवं विश्वासपूर्वक यह मान लिया जाये कि यहाँ ईश्वर है।

13. स्वाहा क्यों बोलते है ? :-  यज्ञ की अग्नि में आहुति डालते समय मंत्रोच्चारण करते हुए देवताओ का आहान किया जाता है और अंत में स्वाहा बोला जाता है। वास्तव में स्वाहा अग्निदेव की पत्नी का नाम है। आहुति अग्नि को समर्पित करते समय स्वाहा इसलिए बोलते है ताकि उनकी कृपा प्राप्त होने पर अग्निदेव भी सहज कृपालु हो जाये।

14. तीर्थाटन का महत्व:-  मनुष्य के कायिक, मानसिक और आत्मिक तापो के शमनार्थ तीर्थाटन का विधान किया गया। तीर्थ क्या है ? जहाँ पर विशेष प्रकार के जल की उपलब्धि हो, जो भूमि विशिष्टता लिए हो और जहाँ पर देवी-देवताओ एवं साधु-महात्माओ का संसर्ग सुलभ हो। ऐसी जगह में तारक अर्थात तारे वाली शक्ति आ जाती है। तीर्थो का धार्मिक महत्व के साथ लौकिक महत्व भी है। तीर्थो की पांच विशेषताएं सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानी गयी है। ये है प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक महत्व, सांस्कृतिक अदान-प्रदान, पूर्वजो की यादगारे और राष्ट्रीय एकता का प्रतिक। भारत के सभी तीर्थ हमारी ऐतिहासिक परंपरा की गरिमामयी पीठे है, जो हमें सर्वधर्म समभाव का पाठ पढाती है। यही हमें भारतीय एकता के दर्शन भी होते है।

15. गणपति को कैथ का भोग:-  गणेशजी के समबन्ध में शतमोदकप्रिय उक्ति प्रचलित है, यानि एक बार में सौ लड्डू खा जाना उन्हें बहुत प्रिय है। मीठा प्रिय होने के कारन वे गुड एवं मोदक भी खाते रहते है। अधिक मीठा खाने से रोग होते है, इसलिए उन्हें कैथ चढ़ाया जाता है। इसकी महता गणेश पूजन के दौरान बोले जाने वाले मंत्रो में भी बताई गयी है।

16. वृक्षो के पूजन का महत्व:-  विभिन्न प्रकार के वृक्षो की पूजा-उपासना भिन्न-भिन्न प्रकार से की जाती है। अशोक अष्टमी के दिन अशोक के वृक्ष की पूजा की जाती है, जिसमे शोक नष्ट होते है और प्रसन्नता प्राप्त होती है। वट सावित्री के अवसर पर बरगद के पेड़ की पूजा की जाती है। इसकी पूजा करने से स्त्रियो को अचल सौभाग्य की प्राप्ति होती है। कार्तिक मास में आंवले के वृक्ष की पूजा एवं परिक्रमा करके स्त्रिया अपने सुहाग का वरदान मांगती है। वास्तव में आंवले के वृक्ष में भगवान विष्णु का निवास माना गया है। तुलसी का प्रतिदिन पूजन करना और जल चढ़ाना स्त्रियो के लिए शुभकारी है। पीपल के पेड़ की पूजा करने से भी अत्यंत शुभ लाभ मिलते है। पारिजात वृक्ष की 'कल्पतरु' के तौर पर पूजा की जाती है।

17. क्यों जरुरी है परिक्रमा ? :-  प्राण प्रतिष्ठित देवमूर्ति जिस स्थान पर स्थापित होती है, उसके मध्य बिंदु से चारो ओर कुछ दुरी तक दिव्य शक्ति का आभामंडल रहता है। उस आभामंडल में उसकी आभा शक्ति के सापेक्ष परिक्रमा करने से श्रदालु को सहज ही आध्यात्मिक शक्ति मिलती है। परिक्रमा के दौरान देवी-देवता के मन्त्र का जाप करते रहना चाहिए

18. गंगाजल की महता अपार:-  भगवान श्रीकृष्ण ने श्रीमदभागवत में कहा है कि स्रोत सामास्मि जाहवी अर्थात जल स्त्रोतो में मै ही जाहवी (गंगा) हुँ। इस प्रकार गंगा श्रीहरि का ही एक स्वरूप है। गंगाजी की महता प्रकट करते हुए स्कन्दपुराण में कहा गया है कि जिस प्रकार अग्नि का स्पर्श करने पर बिना इच्छा के भी अग्नि जला देती है, उसी प्रकार गंगा के जल में स्नान करने पर बिना इच्छा किये हुए ही गंगाजी सभी पापो को धो देती है। विभिन्न धर्मग्रंथो में गंगाजी की पवित्रता और महता को स्वीकार किया गया है। इसके साथ ही गंगाजल पर विभिन्न शोधो से स्पष्ट हुआ है कि वर्षो तक रखने पर भी यह ख़राब नहीं होता। गंगाजल में स्वास्थ्यवर्धक तत्वो की बहुलता है।

19. आसन का शास्त्रीय महत्व:-  काम्य कर्म या कामना की पूर्ति हेतु अनुष्ठान में लाल रंग के कंबल का आसन श्रेष्ठ कहा गया है। ज्ञान सिद्धि या प्राप्ति के लिए काले मृग के चर्म का अखंडित आसन उपयुक्त कहा गया है। मोक्ष प्राप्ति के लिए व्याघ्रचर्म सबसे उपयुक्त कहा जाता है। कुश के आसन पर बैठने से सभी मंत्रो की सिद्धि हो जाती है।

20. पूजा-पाठ में शंखनाद की महता:-  रणवीर भक्तिरत्नाकर स्कंदे के शास्त्रकार लिखते है- यस्य शंखध्वनि कुर्यात् पूजाकाले विशेषतः। विमुक्त सर्वपापेन विष्णुना सह मोदते।। अर्थात पूजा-अर्चना के समय जो शंखनाद करता है, उसके सभी पाप नष्ट हो जाते है और वह भगवान श्रीहरि के साथ आनन्दपूर्वक रहता है। इसी कारण सभी धार्मिक और शुभ कार्यो मसलन विवाह, विजयोत्सव, राज्याभिषेक और पूजन-अर्चन आदि के अवसर पर शंखनाद करने की परंपरा ने समय के साथ-साथ अनिवार्यता का रूप ले लिया है। मंदिरो में भी सूर्योदय और सूर्यास्त होने पर शंखनाद की परंपरा है। इसके बारे में मान्यता है कि सूर्य की किरणे ध्वनि-तरंगो में बाधा डालती है और शंखनाद में प्रदुषण दूर करने की अदभुत क्षमता होती है।

                                     
                                                  यहाँ तक दितीय पेज समाप्त होता है।

     


      

मंगलवार, 19 नवंबर 2013

उपयोगी जानकारिया

भारतवर्ष में कई परम्पराओ का पालन किया जाता है। परन्तु उनको पालन करने के पीछे क्या कारण है ? यह हमें ज्ञात नहीं होता। किन्तु हमारे शास्त्रो में लिखा है कि हर कार्य को करने के पीछे कोई प्रमुख कारण छिपा होता है। आज हम ऐसे ही कुछ मान्यताओ एवं उनके पीछे छिपे हुए कारणो एवं महत्व को बताएँगे:-

1. पूजा-पाठ में फूलो का महत्व:-  कलिका पुराण के अनुसार किसी भी देवी-देवता को बासी, कटा-फटा, गन्दा, कीड़ा लगा, माँगा हुआ और चोरी किया हुआ पुष्प नहीं चढ़ाना चाहिए। चंपा की कली के अलावा किसी भी पुष्प की कली देवताओ को अर्पित नहीं की जाती। केतकी के पुष्प किसी पूजन में नहीं चढ़ाये जाते। 

2. रंगो के अनुरूप हो पहनावा:-  विभिन्न रंगो के वस्त्र धारण करने से शरीर पर उसके अनुकूल प्रभाव पड़ता है। रेशम का वस्त्र (पिताम्बर) धारण करने से अथवा ऊनी या लाल रंग के वस्त्र धारण करने से कफ का शमन हो जाता है। अतः सर्दी के दिनों में इन्हे धारण करना चाहिए। केसरिया रंग का वस्त्र धारण करने से पित्त शांत होता है। इससे शरीर को शीतलता मिलती है और पवित्रता आती है। गर्मियों के महीने में महीन एवं हलके वस्त्र धारण करने चाहिए। सफ़ेद वस्त्र शुभता के प्रतिक कहे गए है। जो न शीतल हो न गर्म, ऐसे वस्त्र वर्षाकाल में धारण करने चाहिए। नए स्वच्छ वस्त्र कीर्ति में वृद्धि करने वाले, काम में वृद्धि करने वाले, आयुवर्धक कहे गए है। नए वस्त्र धारण करने से शोभा में भी वृद्धि होती है।   

3. धर्म है माता -पिता की भक्ति:-  माता-पिता के द्वारा ही प्रत्यक्ष रूप से संतान का जन्म होता है। अतः स्प्ष्ट रूप से संतान के लिए उसके माता-पिता ही सर्वप्रथम देवता है। माता अपनी संतान को जन्म देने से पूर्व नौ माह तक अपने गर्भ में रखकर, तरह-तरह के कष्ट सहकर उसे जन्म देती है। इसी कारण संतान के लिए पिता से भी बढ़कर माता का स्थान विधि-विधान में बताया गया है।

4. शिखा रखने की उपयोगिता:-  शिखा रखने के बारे में हमारे ऋषि-मुनियो का कथन है कि यह हिन्दू धर्म का उपलक्षण है। प्रकृति और विज्ञानं के सिद्धांतो के आधार को समझने के लिए ही मस्तिष्क की संरचना को भी समझना आवश्यक है। हमारे लघु और दीर्घ मस्तिष्क को जोड़ने वाले केंद्र को 'अधिपति' मर्मस्थल कहा जाता है। यही मस्तिष्क का ह्रदय भी कहा जाता है। इसी स्थान पर ब्रह्मारंध, दितीय आज्ञाचक्र और पीयूष ग्रंथि से संपर्क जोड़ने वाली नाडिया आकर मिलती है। ऊर्जा के उत्सर्जन को रोकने, इस मर्म स्थल की पहचान करने और सुरक्षा की दृष्टि से ही संवेदनशील स्थान पर बाल रखे जाते है और शिखा में गांठ लगायी जाती है।

5. पारद शिवलिंग की महत्ता:-  वाग्भट्ट के अनुसार जो व्यक्ति पारद शिवलिंग का श्रद्धाभाव से पूजन करता है, उसे तीनो लोको पर स्थित शिवलिंगो के पूजन का फल प्राप्त होता है। इसके दर्शन मात्र से सैकड़ो अश्वमेध यज्ञ, करोडो गोदान एवं हजारो स्वर्ण मुद्राओ के दान करने का फल मिलता है। घर में इसके होने से ऋद्धि-सिद्धि का वास माना जाता है।

6. गुरु दीक्षा का महत्व:-  गुरु के पास जो श्रेष्ठ ज्ञान होता है, वह अपने शिष्य को प्रदान करने और उस ज्ञान में उसे पूरी तरह से पारंगत करने की प्रक्रिया ही गुरु दक्षिणा कहलाती है। गुरु दीक्षा गुरु की असीम कृपा और शिष्य की असीम श्रद्धा के संगम से ही सुलभ होती है। गीता में लिखा है- जिस व्यक्ति के मुख में गुरु मन्त्र है, उसके सभी कार्य सहज ही सिद्ध हो जाते है। गुरु के कारण शिष्य सर्वकार्य सिद्धि का मन्त्र प्राप्त कर लेता है। गुरु दीक्षा मुख से मन्त्र आदि बोलकर, दृष्टि के द्वारा अंतर्मन को जगाकर और स्पर्श के द्वारा कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करके दी जाती है। भारतीय परंपरा के अनुसार सभी शिष्यो और साधको के लिए गुरु दीक्षा एक अनिवार्य कर्म है। इसके बगैर कोई भी सिद्धि सम्भव नहीं है।

7. मौलि की परंपरा:-  मौलि बांधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से भगवान वामनदेव ने दानवीर असुरराज बालि की अमरता के लिए उसकी कलाई में मौली के रूप में रक्षासूत्र बांधा था। धर्मग्रंथो के अनुसार मौली बांधने से त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु और महेश एवं त्रिदेवियों सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है।

8. शक्ति स्वरुप ॐ:-  गोपद ब्राह्मण के अनुसार किसी मन्त्र का उच्चारण करते समय आरम्भ में यदि ॐ न लगाया जाये, तो मन्त्र जप निष्फल हो जाता है। मन्त्र के आरम्भ में ॐ लगाने से मंत्रोच्चार से प्राप्त होने वाली शक्ति कई गुना बढ जाती है। ॐ शिव रूप है और मन्त्र शक्ति रूप। इस प्रकार इन दोनों का संयुक्त रूप से उच्चारण करने पर सहज ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। कठोपनिषद में ॐ की स्पष्ट व्याख्या करते हुए कहा गया है कि ॐ ही ब्रह्मा और परब्रह्मा है। इसी अक्षर का महत्व व ज्ञान पाकर मनुष्य जो चाहता है, सहज ही पा लेता है। यही अति उत्तम आलंबन है और यही सबका अंतिम आश्रय भी है। ॐ का उच्चारण सात, ग्यारह। इक्कीस अथवा इक्यावन बार करने से पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।