भारतवर्ष में कई परम्पराओ का पालन किया जाता है। परन्तु उनको पालन करने के पीछे क्या कारण है ? यह हमें ज्ञात नहीं होता। किन्तु हमारे शास्त्रो में लिखा है कि हर कार्य को करने के पीछे कोई प्रमुख कारण छिपा होता है। आज हम ऐसे ही कुछ मान्यताओ एवं उनके पीछे छिपे हुए कारणो एवं महत्व को बताएँगे:-
1. पूजा-पाठ में फूलो का महत्व:- कलिका पुराण के अनुसार किसी भी देवी-देवता को बासी, कटा-फटा, गन्दा, कीड़ा लगा, माँगा हुआ और चोरी किया हुआ पुष्प नहीं चढ़ाना चाहिए। चंपा की कली के अलावा किसी भी पुष्प की कली देवताओ को अर्पित नहीं की जाती। केतकी के पुष्प किसी पूजन में नहीं चढ़ाये जाते।
2. रंगो के अनुरूप हो पहनावा:- विभिन्न रंगो के वस्त्र धारण करने से शरीर पर उसके अनुकूल प्रभाव पड़ता है। रेशम का वस्त्र (पिताम्बर) धारण करने से अथवा ऊनी या लाल रंग के वस्त्र धारण करने से कफ का शमन हो जाता है। अतः सर्दी के दिनों में इन्हे धारण करना चाहिए। केसरिया रंग का वस्त्र धारण करने से पित्त शांत होता है। इससे शरीर को शीतलता मिलती है और पवित्रता आती है। गर्मियों के महीने में महीन एवं हलके वस्त्र धारण करने चाहिए। सफ़ेद वस्त्र शुभता के प्रतिक कहे गए है। जो न शीतल हो न गर्म, ऐसे वस्त्र वर्षाकाल में धारण करने चाहिए। नए स्वच्छ वस्त्र कीर्ति में वृद्धि करने वाले, काम में वृद्धि करने वाले, आयुवर्धक कहे गए है। नए वस्त्र धारण करने से शोभा में भी वृद्धि होती है।
3. धर्म है माता -पिता की भक्ति:- माता-पिता के द्वारा ही प्रत्यक्ष रूप से संतान का जन्म होता है। अतः स्प्ष्ट रूप से संतान के लिए उसके माता-पिता ही सर्वप्रथम देवता है। माता अपनी संतान को जन्म देने से पूर्व नौ माह तक अपने गर्भ में रखकर, तरह-तरह के कष्ट सहकर उसे जन्म देती है। इसी कारण संतान के लिए पिता से भी बढ़कर माता का स्थान विधि-विधान में बताया गया है।
4. शिखा रखने की उपयोगिता:- शिखा रखने के बारे में हमारे ऋषि-मुनियो का कथन है कि यह हिन्दू धर्म का उपलक्षण है। प्रकृति और विज्ञानं के सिद्धांतो के आधार को समझने के लिए ही मस्तिष्क की संरचना को भी समझना आवश्यक है। हमारे लघु और दीर्घ मस्तिष्क को जोड़ने वाले केंद्र को 'अधिपति' मर्मस्थल कहा जाता है। यही मस्तिष्क का ह्रदय भी कहा जाता है। इसी स्थान पर ब्रह्मारंध, दितीय आज्ञाचक्र और पीयूष ग्रंथि से संपर्क जोड़ने वाली नाडिया आकर मिलती है। ऊर्जा के उत्सर्जन को रोकने, इस मर्म स्थल की पहचान करने और सुरक्षा की दृष्टि से ही संवेदनशील स्थान पर बाल रखे जाते है और शिखा में गांठ लगायी जाती है।
5. पारद शिवलिंग की महत्ता:- वाग्भट्ट के अनुसार जो व्यक्ति पारद शिवलिंग का श्रद्धाभाव से पूजन करता है, उसे तीनो लोको पर स्थित शिवलिंगो के पूजन का फल प्राप्त होता है। इसके दर्शन मात्र से सैकड़ो अश्वमेध यज्ञ, करोडो गोदान एवं हजारो स्वर्ण मुद्राओ के दान करने का फल मिलता है। घर में इसके होने से ऋद्धि-सिद्धि का वास माना जाता है।
6. गुरु दीक्षा का महत्व:- गुरु के पास जो श्रेष्ठ ज्ञान होता है, वह अपने शिष्य को प्रदान करने और उस ज्ञान में उसे पूरी तरह से पारंगत करने की प्रक्रिया ही गुरु दक्षिणा कहलाती है। गुरु दीक्षा गुरु की असीम कृपा और शिष्य की असीम श्रद्धा के संगम से ही सुलभ होती है। गीता में लिखा है- जिस व्यक्ति के मुख में गुरु मन्त्र है, उसके सभी कार्य सहज ही सिद्ध हो जाते है। गुरु के कारण शिष्य सर्वकार्य सिद्धि का मन्त्र प्राप्त कर लेता है। गुरु दीक्षा मुख से मन्त्र आदि बोलकर, दृष्टि के द्वारा अंतर्मन को जगाकर और स्पर्श के द्वारा कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करके दी जाती है। भारतीय परंपरा के अनुसार सभी शिष्यो और साधको के लिए गुरु दीक्षा एक अनिवार्य कर्म है। इसके बगैर कोई भी सिद्धि सम्भव नहीं है।
7. मौलि की परंपरा:- मौलि बांधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से भगवान वामनदेव ने दानवीर असुरराज बालि की अमरता के लिए उसकी कलाई में मौली के रूप में रक्षासूत्र बांधा था। धर्मग्रंथो के अनुसार मौली बांधने से त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु और महेश एवं त्रिदेवियों सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है।
8. शक्ति स्वरुप ॐ:- गोपद ब्राह्मण के अनुसार किसी मन्त्र का उच्चारण करते समय आरम्भ में यदि ॐ न लगाया जाये, तो मन्त्र जप निष्फल हो जाता है। मन्त्र के आरम्भ में ॐ लगाने से मंत्रोच्चार से प्राप्त होने वाली शक्ति कई गुना बढ जाती है। ॐ शिव रूप है और मन्त्र शक्ति रूप। इस प्रकार इन दोनों का संयुक्त रूप से उच्चारण करने पर सहज ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। कठोपनिषद में ॐ की स्पष्ट व्याख्या करते हुए कहा गया है कि ॐ ही ब्रह्मा और परब्रह्मा है। इसी अक्षर का महत्व व ज्ञान पाकर मनुष्य जो चाहता है, सहज ही पा लेता है। यही अति उत्तम आलंबन है और यही सबका अंतिम आश्रय भी है। ॐ का उच्चारण सात, ग्यारह। इक्कीस अथवा इक्यावन बार करने से पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।
4. शिखा रखने की उपयोगिता:- शिखा रखने के बारे में हमारे ऋषि-मुनियो का कथन है कि यह हिन्दू धर्म का उपलक्षण है। प्रकृति और विज्ञानं के सिद्धांतो के आधार को समझने के लिए ही मस्तिष्क की संरचना को भी समझना आवश्यक है। हमारे लघु और दीर्घ मस्तिष्क को जोड़ने वाले केंद्र को 'अधिपति' मर्मस्थल कहा जाता है। यही मस्तिष्क का ह्रदय भी कहा जाता है। इसी स्थान पर ब्रह्मारंध, दितीय आज्ञाचक्र और पीयूष ग्रंथि से संपर्क जोड़ने वाली नाडिया आकर मिलती है। ऊर्जा के उत्सर्जन को रोकने, इस मर्म स्थल की पहचान करने और सुरक्षा की दृष्टि से ही संवेदनशील स्थान पर बाल रखे जाते है और शिखा में गांठ लगायी जाती है।
5. पारद शिवलिंग की महत्ता:- वाग्भट्ट के अनुसार जो व्यक्ति पारद शिवलिंग का श्रद्धाभाव से पूजन करता है, उसे तीनो लोको पर स्थित शिवलिंगो के पूजन का फल प्राप्त होता है। इसके दर्शन मात्र से सैकड़ो अश्वमेध यज्ञ, करोडो गोदान एवं हजारो स्वर्ण मुद्राओ के दान करने का फल मिलता है। घर में इसके होने से ऋद्धि-सिद्धि का वास माना जाता है।
6. गुरु दीक्षा का महत्व:- गुरु के पास जो श्रेष्ठ ज्ञान होता है, वह अपने शिष्य को प्रदान करने और उस ज्ञान में उसे पूरी तरह से पारंगत करने की प्रक्रिया ही गुरु दक्षिणा कहलाती है। गुरु दीक्षा गुरु की असीम कृपा और शिष्य की असीम श्रद्धा के संगम से ही सुलभ होती है। गीता में लिखा है- जिस व्यक्ति के मुख में गुरु मन्त्र है, उसके सभी कार्य सहज ही सिद्ध हो जाते है। गुरु के कारण शिष्य सर्वकार्य सिद्धि का मन्त्र प्राप्त कर लेता है। गुरु दीक्षा मुख से मन्त्र आदि बोलकर, दृष्टि के द्वारा अंतर्मन को जगाकर और स्पर्श के द्वारा कुंडलिनी शक्ति को जाग्रत करके दी जाती है। भारतीय परंपरा के अनुसार सभी शिष्यो और साधको के लिए गुरु दीक्षा एक अनिवार्य कर्म है। इसके बगैर कोई भी सिद्धि सम्भव नहीं है।
7. मौलि की परंपरा:- मौलि बांधने की परंपरा तब से चली आ रही है, जब से भगवान वामनदेव ने दानवीर असुरराज बालि की अमरता के लिए उसकी कलाई में मौली के रूप में रक्षासूत्र बांधा था। धर्मग्रंथो के अनुसार मौली बांधने से त्रिदेव यानि ब्रह्मा, विष्णु और महेश एवं त्रिदेवियों सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा की कृपा प्राप्त होती है।
8. शक्ति स्वरुप ॐ:- गोपद ब्राह्मण के अनुसार किसी मन्त्र का उच्चारण करते समय आरम्भ में यदि ॐ न लगाया जाये, तो मन्त्र जप निष्फल हो जाता है। मन्त्र के आरम्भ में ॐ लगाने से मंत्रोच्चार से प्राप्त होने वाली शक्ति कई गुना बढ जाती है। ॐ शिव रूप है और मन्त्र शक्ति रूप। इस प्रकार इन दोनों का संयुक्त रूप से उच्चारण करने पर सहज ही सिद्धि प्राप्त हो जाती है। कठोपनिषद में ॐ की स्पष्ट व्याख्या करते हुए कहा गया है कि ॐ ही ब्रह्मा और परब्रह्मा है। इसी अक्षर का महत्व व ज्ञान पाकर मनुष्य जो चाहता है, सहज ही पा लेता है। यही अति उत्तम आलंबन है और यही सबका अंतिम आश्रय भी है। ॐ का उच्चारण सात, ग्यारह। इक्कीस अथवा इक्यावन बार करने से पूर्ण फल की प्राप्ति होती है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें